युद्ध में एक ओर से महाकाल और दूसरी ओर भगवती विमला मां

कामसेन उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के समकालीन थे। कला, नृत्य और संगीत के लिए विख्यात कामाख्या नगरी में कामकंदला नाम की राज नर्तकी और थी। प्राचीनकाल में यह स्थान कामावती नगर के नाम से विख्यात था। माधवानल जैसे संगीतकार थे। एक बार दोनों की कला से प्रसन्न् होकर राजा ने माधवानल को अपने गले का हार दे दिया। माधवानल ने इसका श्रेय कामकंदला को देते हुए वह हार उसको पहना दिया। इससे राजा ने अपने को अपमानित महसूस किया और गुस्से में आकर माधवानल को राज्य से बाहर निकाल दिया। इसके बावजूद कामकंदला और माधवानल छिप- छिपकर मिलते रहे।

एक बार माधवानल उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की शरण में गए और उनका मन जीतकर उनसे पुरस्कार स्वरूप कामकंदला को राजा कामसेन से मुक्त कराने की बात कही। राजा विक्रमादित्य ने दोनों के प्रेम की परीक्षा ली और दोनों को खरा पाकर कामकंदला की मुक्ति के लिए पहले राजा कामसेन के पास संदेश भिजवाया। राजा के इन्कार करने पर दोनों के बीच युद्ध छिड़ गया।

एक महाकाल का भक्त था तो दूसरा विमला माता का। दोनों ने अपने-अपने इष्टदेव का आह्वान किया तो एक ओर से महाकाल और दूसरी ओर भगवती विमला मां अपने-अपने भक्तों की सहायता करने पहुंच गए। युद्ध के दुष्परिणाम को देखते हुए महाकाल ने विमला माता से राजा विक्रमादित्य को क्षमा करने की प्रार्थना की और कामकंदला और माधवानल को मिलाकर वे दोनों अंतर्ध्यान हो गए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *