याद आता है मीना कुमारी का शायराना अंदाज़

मीना कुमारी जब भी आउटडोर शूटिंग पर जाती थीं तो उनके साथ उनकी किताबें जरूर होती थीं। पैक-अप के बाद वे या तो किताबें पढ़ा करती थीं या फिर पेपर पर अपने विचार लिखा करती थीं। देर शाम को कभी-कभार वे अपने होटल से बाहर आकर टहलने लगती थीं क्योंकि उन्हें चांद देखना अच्छा लगता था।

ना जाने चांद निकले कितने दिन हुए

देखो ना कमसिन चांदनी ने

समुंदर पर एक रहगुजर बना रखी है

जिस पर कोई राह नज़र नहीं आती

मगर कदमों की चाप सुनाई दे रही है

बेशुमार अनदेखे कदमों की चाप।

उनके करीबी बताते हैं कि मीना कुमारी अपनी शेर-ओ-शायरियां अपने कवि मित्रों को लंबे-लंबे पत्रों के जरिए साझा करती थीं। वे भी उन्हें वैसे ही लंबे पत्र लिखकर उनका जवाब दिया करते थे। कभी-कभी वे मित्र उन्हें चौंकाते हुए उनसे मिलने भी आ जाया करते थे। उन दिनों आउटडोर लोकेशन पास के हिल स्टेशन जैसे लोनावाला और खंडाला तक ही सीमित हुआ करती थीं। अगर निर्माता धनवान होता था, तभी वह यूनिट को कश्मीर ले जाता था।

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