बेमिसाल कहानी को बेहतरीन फिल्म में तब्दील नहीं कर पाए डायरेक्टर अभिषेक दुधइय

‘भुज: प्राइड ऑफ इंडिया’ देशभक्ति की जिस कहानी पर बेस्ड है, वह भारतीय सैनिकों और 300 महिलाओं के अभूतपूर्व साहस और सूझबूझ की मिसाल थी। 1971 की भारत-पाक जंग में तब भुज और कच्छ में उन्होंने भारी गोला-बारूद, असलहे और सैनिकों से लैस पाकिस्तान को 1965 वॉर के बाद दोबारा हराया था। 

डायरेक्टर अभिषेक दुधइय इस बेमिसाल कहानी को बेहतरीन फिल्म में तब्दील करने में रह गए हैं। उनके पास कहने को बहुत कुछ था, वह सब आपस में उलझ कर रह गए हैं। फिल्म के पहले 20 मिनट पाकिस्तानी हमलों को समर्पित है। पाकिस्तानी फाइटर प्लेनों को जिस तरह लेफ्टिनेंट विक्रम सिंह और खुद विजय कार्णिक बचा रहें हैं, वह स्तरीय नहीं लगा है। न स्टोरी टेलिंग के लिहाज से और न विजुअली। उन 20 मिनटों में अलग अलग वीर योद्धाओं की एंट्री भी बम धमाकों की तरह ताबड़तोड़ हो रही है। दर्शक को समझने में जरा मुश्किल हो सकती है कि आखिर किन किन एयरबेसों पर हमले हो रहें हैं या उनसे बचने को जंग लड़ी जा रही है।

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