देवी की प्रतिमा बनाने के लिए तवायफ़ के आंगन की मिट्टी क्यों चाहिए होती है.

एक बार एक ऋषि ने देवी की प्रतिमा बनवाई और बड़े गर्व से इसे अपने आश्रम के सामने स्थापित कर दिया ताकि लोग आएं और नौ दुर्गा या नवरात्रि में वहां आकर पूजा कर सकें. उसी रात को देवी उस ऋषि के सपने में आई और कहा कि मेरी नजर में घमंड की कोई इज्जत नहीं है. देवी ने बताया कि उन्हें इंसानियत और बलिदान चाहिए और इसके बिना आस्था खोखली है.

फिर ऋषि ने पूछा, “हे देवी, फिर मैं क्या करूं?” तब देवी ने कहा कि शहर में रहने वाली तवायफों के कोठे से कीचड़ लाओ और कुम्हार से कहो कि इसे मिट्टी में मिलाकर मेरी नई प्रतिमा बनाए. तभी मैं उस प्रतिमा को इस लायक मानूंगी कि जब पुजारी इसमें प्राण प्रतिष्ठा करे, मैं उसमें प्रवेश कर सकूं.

“जिन लोगों को समाज में उपेक्षित कर दिया जाता है, जिन्हें बुरा या पापी समझा जाता है, वे अपनी मर्जी से ऐसे नहीं होते बल्कि जो लोग उनका शोषण करते हैं, वे उन्हें ऐसा बनाते हैं. वे भी मेरे आशीष के हक़दार हैं”, देवी ने कहा और अंतर्धान हो गईं.

ऋषि ने उठकर वही किया जो देवी ने कहा था. तभी से मूर्ति बनाने वाले इसी पुरानी परंपरा का पालन करते हैं.

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